कॉग्रेस के जेष्ठ नेता हिदायतउल्लाह ख़ान पटेल सज्दा-गाह में हुआ अपराध इंसानियत ईमान और मस्जिद की पवित्रता पर हमला

अकोट [प्रतिनिधी] ज़ोहर की नमाज़ का समय था मस्जिद में सुकून और इत्मीनान की फ़िज़ा छाई हुई थी सफ़ें सजी थीं, पेशानियाँ सज्दों में झुकी थीं, होठों पर ख़ामोश दुआएँ और दिलों में रब की याद रौशन थी उन्हीं नूरानी लम्हों में हिदायत उल्लाह ख़ान पटेल भी दूसरे नमाज़ियों के साथ अल्लाह के हुज़ूर हाज़िर थे नमाज़ के बाद, हमेशा की तरह, उन्होंने सुन्नत और नफ़्ल अदा किए, फिर अपनी जगह बैठकर ज़िक्र-ए-इलाही में मशग़ूल हो गए और क़ुरआन-ए-मजीद की तिलावत करने लगे एक-एक आयत उनके दिल में उतर रही थी नमाज़ अदा कर लोग आहिस्ता-आहिस्ता मस्जिद से रवाना हो गए, लेकिन हिदायत पटेल साहब ज़िक्र और फ़िक्र में डूबे वहीं बैठे रहे जैसे दुनिया से कटकर अपने रब से जुड़ गए हों इसी नूरानी और अमन भरे लम्हे में एक दरिंदा सिफ़त शख़्स मस्जिद के अंदर दाख़िल हुआ और निहत्थे, इबादत में मशग़ूल हिदायत पटेल साहब पर हमला कर दिया यह हमला सिर्फ़ एक शख़्स पर नहीं था; यह अल्लाह के घर की पवित्रता, मस्जिद के तक़द्दुस, अमन, भाईचारे और ईमान की फ़िज़ा पर खुला हमला था इस दर्दनाक हमले में हिदायत उल्लाह ख़ान पटेल गंभीर रूप से ज़ख़्मी हो गए, लेकिन उनके हौसले टूटे नहीं लहूलुहान हालत में भी उन्होंने सब्र, हिम्मत और होशमंदी का दामन नहीं छोड़ा अकेले मोटरसाइकिल पर बैठकर फ़ोन के ज़रिये मदद लेते रहे देर रात तक इलाज चलता रहा पहले अकोट के धांडे अस्पताल में फिर अकोला के ओज़ोन अस्पताल में भर्ती किया गया
लेकिन अल्लाह की मर्ज़ी यही थी कि वह अपने सब्र करने वाले बंदे को अपने पास बुला ले फ़ज्र की अज़ान के बाद, नमाज़ के वक़्त के आसपास, वह अपने हक़ीक़ी मालिक से जा मिले इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन यह हादसा हमारे ज़मीर को झकझोर देता है मस्जिद जहाँ अमन हो, सज्दा हो और दुआ हो वहाँ खून बहाया जाना कितना बड़ा गुनाह और कितना संगीन जुर्म है क़ुरआन-ए-मजीद साफ़ एलान करता है कि मस्जिदें अल्लाह के लिए हैं उनमें ज़ुल्म, फ़साद और ज़्यादती की कोई गुंजाइश नहीं अल्लाह तआला फ़रमाता है कि जो लोग अल्लाह की मस्जिदों को आबाद रखते हैं वही सच्चे मोमिन हैं और जो उनकी पवित्रता को ठेस पहुँचाते हैं वे भारी नुक़सान में हैं क़ुरआन हमें यह भी याद दिलाता है कि एक बेगुनाह इंसान की नाहक़ हत्या पूरी इंसानियत की हत्या के बराबर है तो फिर इबादतगाह में किया गया ज़ुल्म कितना भारी होगा, इसका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है नबी-ए-करीम ﷺ ने मस्जिदों को अमन, सुकून और रहमत की पनाहगाह क़रार दिया है अहादीस में आया है कि मस्जिद में किसी को तकलीफ़ देना डर फैलाना या बेअदबी करना सख़्त नापसंद किया गया है सहाबा-ए-किराम رضی اللہ عنہم मस्जिद के अदब पर जान निछावर कर देते थे। हज़रत उमर رضی اللہ عنہ का यह रवैया तारीख़ में दर्ज है कि मस्जिद में किसी के दिल दुखाने के अंदेशे पर भी सख़्त चेतावनी देते थे हज़रत अली رضی اللہ عنہ का फ़रमान है कि दिलों को जोड़ना इबादत है और मस्जिद उस जोड़ की सबसे पाक जगह है हिदायत उल्लाह ख़ान पटेल की यह दर्दनाक रुख़्सती हमें यह पैग़ाम देती है कि ईमान सिर्फ़ ज़ुबान का इक़रार नहीं, बल्कि सब्र, इस्तेक़ामत और रज़ा-ब-क़ज़ा का नाम है ज़ख़्मी हालत में भी उनकी मज़बूती, आख़िरी साँस तक हौसला और फिर ख़ामोशी से रब की मर्ज़ी पर सर झुका देना—यह सब हमारे लिए मशाल-ए-राह है आज वक़्त की माँग है कि हम मस्जिदों की पवित्रता की हिफ़ाज़त करें, नफ़रत और हिंसा के ख़िलाफ़ एकजुट हों, और क़ानून व अख़लाक़ दोनों मोर्चों पर मज़बूती से खड़े हों इबादतगाहों को सियासत, तअस्सुब और जुनून से पाक रखना हम सबकी साझा और दीनि ज़िम्मेदारी है आख़िर में हम अल्लाह की बारगाह में दुआ करते हैं ऐ अल्लाह मरहूम हिदायत उल्लाह ख़ान पटेल की कामिल मग़फ़िरत फ़रमा, उनके दर्जे बुलंद फ़रमा, उनकी लग़्ज़िशों से दरगुज़र फ़रमा और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमा
ऐ रब्बे करीम उनके अहले-ख़ानदान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा, उनके दिलों को सुकून नसीब कर और अपनी रहमत से उनकी कमी को पूरा फ़रमा
ऐ अल्लाह हमारी मस्जिदों को हमेशा अमन का गहवारा बनाए रख, हमें उनके अदब और हुरमत का मुहाफ़िज़ बना और हर तरह के फ़साद, ज़ुल्म और फ़ितने से महफ़ूज़ रख आमीन या रब्बुल आलमीन


